Tuesday, 16 October 2012

रंग


दो कजरारी आंखे 
झपकाते हुए ,
सागर की  सी गहराई लिए 
आँखों से ...

मैं अक्सर 

तुम्हारी तस्वीर में
अपने रंग खोजती हूँ ,
जो रंग 

 कभी मैंने तुम्हें दिए थे ,
उनका क्या हुआ ...


सागर की सी गहराई लिए 
दो आँखे ,
 
कजरारी आँखों को 
एक टक देखते हुए ...

हाँ वो रंग,
 अभी भी मेरे पास है और 
बहुत प्रिय भी 

उन रंगों को  चाह कर 
भी मेरे जीवन 
के केनवास पर नहीं 

उतार पाता...

 मैंने वो  रंग 
अपने मन के कैनवास पर 
सजा रखे है 
कजरारी आँखें बरस पड़ी 
सागर सी गहराई वाली
 आँखों की गहराई 
कुछ और गहरी हो गयी ....