Thursday, 25 October 2012

कान्हा वंशी फिर से बजा दो ...

कान्हा एक बार 
वंशी फिर से बजा दो ...
वह धुन छेड़ो ,
जिसे सुन कर 
हर कोई मंत्रमुग्ध सा 
हो रहे ...
किसी को कोई सुध-बुध
ही ना रहे ....
इस धरा का कण- कण ,
तुम्हारी वंशी की तान में
मोहित सा,
मंत्रमुग्ध हो रहे...
ऐसी ही कोई तान छेड़ो .
कान्हा ...!
मैं चली आऊं,
तुम्हारी वंशी की मधुर तान
की लय पर बहती हुयी .....

19 comments:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 27/10/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  2. सुंदर भाव रचना..
    :-)

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  3. कान्हा का यही चरित्र सबको भाता है

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  4. बेहतरीन भाव सुन्दर रचना

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  5. उत्कृष्ट भाव सुंदर रचना,,,,

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  6. अनुपम भाव लिये मन मोहती रचना

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  7. वाह,क्या बात है

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  8. उपासना जी ...भावपूर्ण भक्तिमय प्रस्तुति

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  9. भक्तिमय रचना .....

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  10. समर्पण भाव में सराबोर रचना आभार

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  11. kanha ki bansi sabka man moh leti hai....bhavpurn

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  12. कितने मधुर क्षणों की कल्पना कर रही हैं !

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