Friday, 25 September 2015

क्या अब भी असहाय है राजकुमारियाँ ..


कैसी है
अंधेर नगरी यह,
भेड़िये घूमते हैं
दिन -दिहाड़े यहाँ ।

सुना था कभी
भेड़िये की मौत ही
खींच लाती है उसे
नगर की ओर ।

जमाना बदला है
या कहावत
 शिकार के लिए आते है यहाँ,
अब ये भेड़िये,
होते हैं पोषित
 राक्षसों के महलों में।

राजकुमार,
राजकुमार रहे ही कहाँ
लगता है झुक गए हैं  वह
राक्षसों के आगे
लगे हैं भेड़ियों के सुर में सुर मिलाने।

तो क्या अब भी असहाय  है
राजकुमारियाँ !
क्या इंतजार है अब भी उनको
किसी राजकुमार का ?

नहीं !
उसे नहीं है  इंतज़ार किसी
राजकुमार का,
अब  मशाल ले ली है उन्होंने
हाथों में अंपने
चल पड़ी है अपना मार्ग
खुद ही प्रशस्त करने।