रुदाली जिसे सिर्फ सुना,
पढ़ा है
कभी देखा नहीं ...
कभी
पढ़ा है
कभी देखा नहीं ...
कभी
उसको सोचती हूँ,
उतरती हुई पाती हूँ
कहीं अपने भीतर ही।
उसका रुदन, क्रंदन,
अनवरत बहते आंसू
कहीं से भी झूठे नहीं
लगते ...
क्या वह
वह अभिजात्य वर्ग की
लाश पर रुदन
करती है ...!
नहीं,
वह तो उनके दिए
क्रूर दंश पर रोती है।
उसका
क्रंदन और भी तेज़
हो जाता है
जब लुटी अस्मत दिखाई दे
जाती है
लाश में बेटी की !
कभी मैं सोचती हूँ,
क्या रुदाली सिर्फ एक
व्यक्तित्व ही है ...!
एक भावना नहीं है क्या !
जो कहीं न कहीं .
निवास करती है हमारे भीतर भी।
क्यूँ कि अक्सर
हम भी
अपने दुखों को ही रो रहे
होते है .
दूसरों की लाशों पर।
उतरती हुई पाती हूँ
कहीं अपने भीतर ही।
उसका रुदन, क्रंदन,
अनवरत बहते आंसू
कहीं से भी झूठे नहीं
लगते ...
क्या वह
वह अभिजात्य वर्ग की
लाश पर रुदन
करती है ...!
नहीं,
वह तो उनके दिए
क्रूर दंश पर रोती है।
उसका
क्रंदन और भी तेज़
हो जाता है
जब लुटी अस्मत दिखाई दे
जाती है
लाश में बेटी की !
कभी मैं सोचती हूँ,
क्या रुदाली सिर्फ एक
व्यक्तित्व ही है ...!
एक भावना नहीं है क्या !
जो कहीं न कहीं .
निवास करती है हमारे भीतर भी।
क्यूँ कि अक्सर
हम भी
अपने दुखों को ही रो रहे
होते है .
दूसरों की लाशों पर।
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (20-09-2015) को "प्रबिसि नगर की जय सब काजा..." (चर्चा अंक-2104) पर भी होगी।
ReplyDelete--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
हम भी
ReplyDeleteअपने दुखों को ही रो रहे
होते है .
दूसरों की लाशों पर।
...बिलकुल सच कहा है...बहुत मर्मस्पर्शी रचना...
डिम्पल की एक फिल्म देखी थी जिसने बहुत ही प्रभावित किया था ... बहुत ही मर्म-स्पर्शीय रचना है ...
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