Saturday, 19 September 2015

रुदाली


रुदाली जिसे सिर्फ सुना,
पढ़ा है
कभी देखा नहीं ...

कभी
उसको सोचती हूँ,
उतरती हुई पाती हूँ
 कहीं अपने भीतर ही।

उसका रुदन, क्रंदन,
अनवरत बहते आंसू
कहीं से भी झूठे नहीं
लगते ...

क्या वह
वह अभिजात्य वर्ग की
लाश पर रुदन
करती है ...!
नहीं,
वह तो उनके दिए
क्रूर दंश पर रोती है।

 उसका
क्रंदन और भी तेज़
हो जाता है
जब लुटी अस्मत दिखाई दे
जाती है
लाश में बेटी की !

कभी मैं सोचती हूँ,
क्या रुदाली सिर्फ एक
व्यक्तित्व ही है ...!

एक भावना नहीं है क्या !
जो कहीं न कहीं .
निवास करती है हमारे भीतर भी।

क्यूँ कि अक्सर
हम भी
अपने दुखों को ही रो रहे
होते है .
दूसरों की  लाशों पर।