Tuesday, 29 September 2015

मैं धरती- पुत्र मंगल हूँ...

मैं धरती- पुत्र
मंगल हूँ
और मानव,
तुम भी तो
धरती- पुत्र ही हो।

फिर तो
मेरा और तुम्हारा |,
रक्त -सम्बन्ध
ही हुआ ना।


मैं प्रवाहित होता हूँ
तम्हारी रगों में
रक्त बन कर ,
रक्त संबंधों को
मजबूत करता हुआ।

ओज- पूर्ण


व्यक्तित्व देता हूँ मैं |
तुम्हारे भीतर एक
उर्जा का.
शक्ति का संचार कर।

जब भी आता हूँ किसी


क्रूर ग्रह के घेरे में,
क्रूरता की पराकाष्ठा पार भी
मैं ही कराता हूँ,
तुम्हारे व्यक्तित्व को।

मुझे हंसी
आ जाती है
जब तुम शोर मचाते हो
मंगल पर पानी मिल गया है,
अपने अंदर के पानी को भुला कर।

और सोचता हूँ
ऐसा भी समय आएगा
शायद
जब कहा जायेगा
रहा करता था कभी
इस धरती पर मानव

उसमे भी पानी था
शर्म का
मानवता का ...!