Thursday, 6 November 2014

औरत सदा अकेली ही रहती है ..

औरत सदा
अकेली ही रहती है
कौन साथ देता है उसका !
कोई भी नहीं।

अपनी मंज़िल के लिए 
बढाती है वह खुद 
अपना पहला कदम ,
सहारा बनने के लिए 
कौन साथ देता है उसका !
कोई भी नहीं।

अपना पथ
स्वयं ही बुहारती -सवांरती ,
 पथ के कांटे भी 
खुद ही निकालती है। 

लेकिन 
जाने -अनजाने में 
अपने पीछे ही फैंक देती है वह ,
वे पथ के कांटे। 
उसे चुभन का 
अहसास ही नहीं हुआ  
कभी शायद। 

तभी तो 
उसके बाद 
आने वाली औरतों को 
विरासत में 
कांटे ही मिलते है बुहारने को। 

एक औरत ,
दूसरी औरत को
 फिर से अकेला छोड़ देती है ,


अपनी  राह खुद ही चलने को।