Tuesday, 11 November 2014

मिट्टी की मूरतों में प्राण ही नहीं...

पत्थरों के शहर में
मिट्टी की मूरतें है।
अग्नि सी आंधियां
तेज़ाबी बरसातें है।

ना जाने क्यों
न पत्थर पिघलते हैं
और
न ही मिट्टी की मूरतें
भुरभुराती है।

पत्थरों को पिघलने की
चाहत ही ना रही ...
बसंत का इंतज़ार ही नहीं उसे,
तभी तो शायद
मिट्टी की मूरतों में प्राण ही नहीं
या जीने की ही चाह ना रही ।