Tuesday, 6 May 2014

एक छवि है उसकी भी ...

कोई है
 जो बेनाम है
बनता अनजान है।

क्या जाने
वो रूठा या माना हुआ ,
गुमशुदा है
या आस-पास ही रहता है !

 सोचता है
अदृश्य है वह
मुझसे !
क्यूंकि निराकार है वह।

हां शायद
वह निराकार ही है !
लेकिन
अनजान है वह।

एक छवि है
उसकी भी
एक जानी  पहचानी सी
जो मेरे अंतर्मन में  साकार है।




13 comments:

  1. बेहतरीन अभिव्यक्ति..

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  2. बेनाम, निराकार अनजाना जो पहचाना जाता है मन की छवि से बस ...

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  3. बहुत सुंदर लेखन हैं आपका , उपासना जी सदा ही धन्यवाद व इसी तरह आप लिखें व हम आपके लेखन का आनंद लें !
    I.A.S.I.H ब्लॉग ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )

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  4. बहुत बढ़िया..उपासना जी

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  5. ☆★☆★☆



    एक छवि है उसकी
    जानी-पहचानी-सी
    जो मेरे अंतर्मन में साकार है !

    बहुत सुंदर !

    आदरणीया उपासना जी
    कविता ऊंचाइयां स्पर्श करती प्रतीत होती है...
    साधुवाद !

    मंगलकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार


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  6. अन्तर्मन मे सुंदर छवि संग्रहीत :) बेहतरीन !!

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  7. आपकी इस उत्कृष्ट अभिव्यक्ति की चर्चा कल रविवार (11-05-2014) को ''ये प्यार सा रिश्ता'' (चर्चा मंच 1609) पर भी होगी
    --
    आप ज़रूर इस ब्लॉग पे नज़र डालें
    सादर

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  8. बहुत सुंदर

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  9. सुंदर। निराकार का भी एक आकार होता है हमारे मन में।

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  10. सुन्दर अभिव्यक्ति....

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  11. निराकार तो अंतर्मन में ही साकार हो सकता है सुन्दर रचना उपासनाजी

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