Tuesday, 6 May 2014

एक छवि है उसकी भी ...

कोई है
 जो बेनाम है
बनता अनजान है।

क्या जाने
वो रूठा या माना हुआ ,
गुमशुदा है
या आस-पास ही रहता है !

 सोचता है
अदृश्य है वह
मुझसे !
क्यूंकि निराकार है वह।

हां शायद
वह निराकार ही है !
लेकिन
अनजान है वह।

एक छवि है
उसकी भी
एक जानी  पहचानी सी
जो मेरे अंतर्मन में  साकार है।