Wednesday, 28 May 2014

यह जीवन हर दिन आस भरा

यह जीवन
हर दिन आस भरा
उम्मीद भरा
भोर से साँझ तक।

हर रोज़ एक आस
उदित होती है
सूर्य के उदय के
साथ - साथ।

छाया सी डोलती
कभी आगे चलती है
कभी लगता है
दम तोड़ देगी
क़दमों तले
भरी दोपहर में।

नज़र आती है
हथेलियाँ खाली सी
लेकिन
दिन ढले
चुपके से दबे पाँव
पीछे से आ
कन्धों पर हाथ रख देती है।


 रात्रि के  घोर अँधेरे में  ,
निद्रा में भी
आस
पलती है स्वप्न सी।

आस -उम्मीद से
भरा जीवन ही
देता है जीने की प्रेरणा।




10 comments:

  1. उम्मीद के दामन को पकड़े सुन्दर और सराहनीय

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  2. बढ़िया व सुन्दर लेखन , प्रेरणा देती बढ़िया रचना , आदरणीय को धन्यवाद !
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  3. आस और उल्लास विना जीवन कुछ नही..्सुन्दर सार्थक रचना..

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  4. प्रेरक रचना

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  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29-05-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1627 में दिया गया है |
    आभार

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  6. बहुत सुन्दर प्रेरणा डाक रचना !
    new post ग्रीष्म ऋतू !

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  7. सुन्दर भाव...बहुत खूब...

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