Thursday, 21 November 2013

मुझसे ना हो पायेगी विदाई बेटी की

दो पुरुष 
पास -पास बैठे 
एक कुछ अनमना सा ,
उदास कहीं खोया सा
कभी था पत्थर दिल 
आज जैसे पिघला सा 
झुके कंधे 
आँखों में आशंकाओं के बादल लिए ...

दूसरे ने कंधे पहले के कन्धे पर
हाथ रख 
पूछा आँखों ही आँखों में 
 क्यूँ क्या हुआ .....!
जैसे रो ही पड़ा पहला 
बोल पड़ा 
दूसरे का हाथ थाम कर 
 बेटी की विदाई नहीं देखी जाएगी मुझसे ...

दूसरे ने कंधे पहले के कन्धे पर
हाथ रख 
पूछा आँखों ही आँखों में 
 क्यूँ क्या हुआ .....!
जैसे रो ही पड़ा पहला 
बोल पड़ा 
दूसरे का हाथ थाम कर 
 बेटी की विदाई नहीं देखी जाएगी मुझसे ...

इतने प्यार से पाला जिसको
उसे पराये हाथों में कैसे देदूं ,
कलेजा विदीर्ण हुआ  जाता है
सोच कर ही 
मुझसे ना हो पायेगी 
विदाई बेटी की
अब तुम ही करना उसको विदा ...
दूसरा  हंस पड़ा मन ही मन

मन ही मन सवाल भी किया 
पहले से
भरी आँखों से 
अपना -पराया अब  समझे हो ...!
मैंने भी तो पराये हाथों में ही सौपीं थी 
अपनी बहन
क्या मान रखा था तुमने...

दूसरे की आँखों के प्रश्न 
पहला समझ गया शायद 
झुका दी पलकें उसने अपनी 
शर्म से -पश्चाताप से।
दूसरे ने 
निशब्द अपने आसू पोंछ कर
पहले के भी आंसू पोंछते हुए धीरे से
उसके कन्धे थप-थपा दिए ...