Sunday, 15 September 2013

मुझे मालूम है तुम वहां नहीं हो

 तुम नहीं जानते
क्यूँ  करती रही हूँ
मैं ऐसा
और करती ही रहती हूँ
हमेशा -हमेशा ,
जहाँ भी लगता है
तुम्हारा कुछ भी सुराग
पहुँच जाती हूँ
बिन सोचे -बिन रुके
मन और नयन
 तुम्हें ही तलाशते हैं
मुझे मालूम है
तुम
वहां नहीं हो
जहाँ
मैं तलाशती हूँ
मालूम है मुझे यह भी
टकराती हूँ मैं
और
मेरी आवाज़
सिर्फ पत्थरों से ही
लेकिन
फिर भी मैं वहां पहुँच जाती हूँ
जहाँ तुम नहीं होते
लेकिन
तुम्हारा कुछ सुराग पाती हूँ

( चित्र गूगल  से साभार )