Friday, 31 August 2012

ए जिन्दगी

जिन्दगी ...!
आ अब मैं तुम्हे हारना
चाहती हूँ 
तुमसे जीतना मुझे अब 
नामुमकिन 
ही लगता है ...
कभी तुम्हे बुलाया तो
चुप रहने को
कहती हो ,
चुप भी रहूँ तो ढेरों सवाल
लिए आ खड़ी होती हो...
अब बस तुझे बहुत
जी लिया ,
अब तुम्ह्ने हारना
ही चाहती हूँ ...
तुम्हारे आगे - पीछे ,
बहुत घूम लिया मैंने ,
बस अब तुमसे दामन छुड़ाने
को मन करता है ...
कभी मृगतृष्णा सी तुम
और कभी
तुम कस्तूरी की तरह हो
अब मैं तुम्हें तलाशते हुए 
और नहीं खोना चाहती 
तुम्हे हारना ही चाहती हूँ ...
तुम्हारे कोई भी रंग
अब मुझे,
अपनी और नहीं बुलाते ,
अब मैं काले रंग को
ओढ़ कर ही ,
तुम्हारे धुएं में गुम
हो जाना चाहती हूँ ...
ए जिन्दगी !
अब मैं तुम्हे
हारना ही चाहती हूँ...