Saturday, 17 March 2012

क्या लिखूं


किसी ने कहा 
 कुछ ऐसा लिखो
जिसे पढ़  चेतना जाग जाये
सोई हुई आवाम की 

सोच में पड़ गई मैं 
 आवाम  के लिए लिखूं  !
 जागी हुई आवाम के लिए !

चेता करती है जो 
सिर्फ बम के धमाकों से 
या किसी मसीहा के आव्हान पर ही !
और सो जाती है
फिर से किसी मसीहा के इंतज़ार में। 

 ऐसी सोयी हुई 
जनता को जगाने के 
 कविता की नहीं, 
अलख की जरुरत है !
किसी ने फिर टोका 
 चलो नारी के लिए ही लिखो !

लेकिन किस नारी के लिए
जो डूबी हुई है 
दुनियां की चकाचौंध में 
 क्या लिख कर जगाऊं 
 उसे जो 
अपने ही जाल में उलझती जाती है
 हर रोज़ !

ऐसी  सोयी हुई नारी को 
 झिंझोड़ कर - झखझोर कर ,
अपने हाथों से जगाना चाहती हूँ,
लिख कर नहीं !

अब क्या लिखूं ,
किसके लिए लिखूं !