Tuesday, 24 July 2012

हमारा प्रेम


हमारा प्रेम
मुझे पानी के बुलबुले
जैसा ही लगता है ........
ऐसा जैसे थोड़ी सी ठेस लगी
और गुम........
इसलिए मैंने इसे एक छोटी सी
 कांच की पटारी में छुपा कर ,
सहेज कर  रख दिया  है ......
जब - तब तुम्हें देखने का मन
करता है ....
ये पटारी खोल लेती हूँ और इसमें ,
तुम्हारे साथ -साथ
सारा जहाँ नज़र आता है ........
चल पड़ती हूँ
तुम्हारा हाथ थाम .............
पर कभी डर भी लगता है क्या वो
दिन भी आ जायेगा कभी
ये पटारी खोलूंगी और
आस-पास की गरम हवाएं
इसे उड़ा ही ना ले जाये .....
इसे खोलने से पहले
मैं , उन गरम हवाओं को
अपने आंसुओं से नम किये
रखती हूँ ..........