Tuesday, 7 June 2016

घर मेरा है बादलों के पार ....




दिन-रात
सुबह -शाम
भोर -साँझ
कुछ नहीं बदलते
दोनों समय का नारंगीपना.....

उजली दोपहर
अँधेरी काली आधी रात हो
सब चलता रहता है
अनवरत सा ....

सब कुछ
 वैसे ही रहता है
बदलता नहीं है !

किसी के ना होने
या
 होने से ....

फिर क्यों
भटकता है तेरा मन
बंजारा सा

दरवाजा बंद या
है खुला
क्यों झांक जाता है तू !

क्यों ढूंढ़ता है मुझे
गली-गली ,
नुक्कड़-नुक्कड़ !

यहाँ
मेरा कोई पता है ना
ना ही कोई ठिकाना ....

घर मेरा है
बादलों के पार !
मिलना है तो फैलाओ पर
भरो उड़ान,
चले आओ ....


10 comments:

  1. फिर क्यों
    भटकता है तेरा मन
    बंजारा सा



    उपासना जी बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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  2. बदलता तो कुछ भी नहीं फिर भी इंसान है की उम्र ढलती है ...

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 9-6-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2368 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  4. बहुत सुन्दर और गहन अभिव्यक्ति..

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  5. बहुत सुन्दर

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