Saturday, 20 June 2015

प्रेम तुम सिर्फ जीवन हो..

मैंने लिखा
प्रेम !
तुमने लिखा
विदाई !

प्रेम ,
तुम्हारा नाम
विदाई है क्या !

 चल पड़े
यूँ मुँह फेर के ,
पीठ घुमा कर।

एक बार भी
मेरी पुकार
क्या तुम
सुनोगे नहीं !

क्यूंकि
प्रेम का अर्थ
विदाई नहीं है।
केवल
प्रेम ही है,
मनुहार भी है।

लेकिन मनुहार
क्यों ,
किसलिए
तुम
 कोई  रूठे हो क्या मुझसे !

सच में रूठे हो !
फिर वंशी की धुन
किसे सुनाते हो !

प्रेम तुम
सिर्फ
जीवन हो  ,
मृत्यु नहीं !




7 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-06-2015) को "योगसाधना-तन, मन, आत्मा का शोधन" {चर्चा - 2013} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. वाह ... प्रेममय रचना ... बंसरी अपने आप शब्दों ने बजा दी ...

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  3. बहुत सुन्दर

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  4. वाह ---- प्रेम पर लिखी बेहद खुबसूरत रचना

    सादर

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  5. प्रेम में रची बसी एक प्रस्तुती
    आभार

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  6. प्रेम तुम
    सिर्फ
    जीवन हो ,
    मृत्यु नहीं !

    यही विश्वास योग्य है, यही शाश्वत है .....

    इस उत्तम रचना के ले लिए बहुत सी शुभकामनायें ....

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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