Saturday, 20 June 2015

प्रेम तुम सिर्फ जीवन हो..

मैंने लिखा
प्रेम !
तुमने लिखा
विदाई !

प्रेम ,
तुम्हारा नाम
विदाई है क्या !

 चल पड़े
यूँ मुँह फेर के ,
पीठ घुमा कर।

एक बार भी
मेरी पुकार
क्या तुम
सुनोगे नहीं !

क्यूंकि
प्रेम का अर्थ
विदाई नहीं है।
केवल
प्रेम ही है,
मनुहार भी है।

लेकिन मनुहार
क्यों ,
किसलिए
तुम
 कोई  रूठे हो क्या मुझसे !

सच में रूठे हो !
फिर वंशी की धुन
किसे सुनाते हो !

प्रेम तुम
सिर्फ
जीवन हो  ,
मृत्यु नहीं !