Friday, 21 December 2012

एक गृहिणी.......

एक गृहिणी
जब कलम उठाती है ...
लिखती है वह
खिलते फूलों पर
उगते सूरज पर
नन्ही किलकारियों पर
मासूम मुस्कानों पर ...


वह लिखती है
ममता की स्याही में
कलम को डुबो कर ....

 लेखनी में उसकी
उमड़ पड़ता है ढेर सारा
प्यार , दुलार और
बहुत सारा स्नेह ,
सारी  प्रकृति खिल उठती है ....

एक गृहिणी ,
एक नारी भी है
एक माँ भी है ......

क्या लिखे वह अपनी
 कलम से
दूसरी नारी की व्यथा
एक बेटी की दुर्दशा ...!

नहीं ,वह उठा ही नहीं
 पाती कलम
दर्द की स्याही से
' स्याह ' अक्षर नहीं लिख पाती ...






14 comments:

  1. बस महसूस करती है .... सुंदर अभिव्यक्ति

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  2. kyoki vo bahut kuch mahsus karti hai aur dard ko apne paas hi rakhti hai

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (22-12-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  4. कैसे कुछ लिखे वो इस दर्द के साथ ...... सुंदर रचना

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  5. वह सब लिखते जी फटता है -जो दूसरों के दुष्कृत्यों की पीड़ा भोग रही है रह-रह कर उसके दर्द का एहसास चैन नहीं लेने देता .यह सब देख-सह कर अगर नारी का स्वभाव बदल जाये तो जिम्मेदार कौन ?

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  6. बेटी की दुर्दशा पर तलवार उठाती
    खुद नहीं लड़ी कभी
    लेकिन बेटी को लड़ना
    सिखाती है
    जीवन का हर संघर्ष
    उसे समझाती है
    खुद कमजोर सही लेकिन
    बेटी को बहादुर बनाती है
    वो सिर्फ एक ग्रेह्नी थी
    बेटी को जिन्दगी का सच
    समझाती है .....रमा

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  7. उसी गृहणी का अंगार में कलम डुबो कर लिखने का वक़्त आ गया सहनशीलता की हदें लांघ चुका है नारी अस्तित्व ,भावनाओं को कोमलता से व्यक्त करती हुई रचना हेतु बधाई

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  8. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..!
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (23-12-2012) के चर्चा मंच-1102 (महिला पर प्रभुत्व कायम) पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  9. बस महसूस कर सिहर उठती है..
    उस बहन ,बेटी की चीख उसकी पीड़ा को...
    बेहद मार्मिक रचना...

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  10. मां का दर्द...लेकिन कलम तो उठनी होगी...
    अपने लिए, अपनी बेटी और अपने बच्चों के लिए, नारी पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ लड़ना ही होगा...

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  11. मन की भावनाओं को कोमलता से व्यक्त करती सुंदर रचना,,,, बधाई उपासना जी,,,


    recent post : समाधान समस्याओं का,

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  12. गृहिणी की कलम से अंगार , थोडा मुश्किल तो है !
    शब्द सक्षम है अनुभूति को व्यक्त करने में !

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  13. वह उठा ही नहीं पाती कलम
    दर्द की श्याही से
    स्याह अक्षर नहीं लिख पाती

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