Friday, 16 November 2012

करैक्टर लेस..


सुना है वह आजकल
बहुत गुनगुनाती है 
हंसती भी बहुत है ....

सुना है वह
उडती तितलियों को
पकड़ने दौड़ पडती है
नंगे  पाँव ही ...

सुना है उसे
अब देहरी लांघने से
भी संकोच नहीं होता ...

सुना है वह
अपने फैसले खुद ही
लेने लगी है ......

सुना है वह अब
सजी संवरी गुडिया या
कठपुतली की तरह
अपने सूत्रधारों के
वश में नहीं रहती ........

सुना तो बहुत  कुछ है
 वह आज-कल
'करैक्टर लेस' हो गयी है ....

 शब्दों को
कानो में  पिघले शीशे की
तरह सहन करती
मुस्करा पड़ती है  वह .........

इस रंग बदली दुनिया में
 ' करेक्टर - लेस ' हो
या
करेक्टर से " लैस "........
बस सुना ही करती है वह ....