Wednesday, 19 September 2012

कुछ पल

अचानक ,
ख्याल आया ...
समय के रेले में 
बढ़ते -बढ़ते ,
बहते-बहते ,
और 
चलते -चलते ,
पता ही नहीं चला 
मैं ,अपना ही 
अस्तित्व खोती
जा रही हूँ ........
ऐसे तो मैं , 


एक दिन ,
समय की नदी में
बहती -बहती ,
लुढ़कती- लुढ़कती,
इसी की मिटटी में ही
मिल जाउंगी ....,
समय की नदी की
कल-कल और
लहरों की कोलाहल
मैं ही खोयी रही ,
कभी अपने अंतर्मन
की आवाज़ 


मुझे सुनायी क्यूँ
नहीं दी ....
नदी की लहरों से
परे हट कर ,
जरा एक तरफ खड़े हो कर
देखा तो लगा ,
समय को रोक पाने की
हिम्मत तो नहीं है ,
पर कुछ पल तो
मैं अपनी
मुट्ठी में कर ही सकती हूँ...
जिन्हें कभी खोल कर देखूं
तो मुस्कुरा लूँगी........