Sunday, 16 September 2012

मेरा पहला प्रेम-पत्र .........


बरसों बाद किताबों में दबा
 एक मुड़ा-तुड़ा एक कागज़
 का टुकड़ा मिला .....
खोल कर देखा तो याद आया ,
ये तो वो ख़त है जो मैंने लिखा 
था उसको.......
हाँ ये मेरा ही लिखा हुआ था 
प्यार भरा ख़त ...
या कहिये मेरा पहला प्रेम-पत्र ,
जो मैंने उसे कभी दिया ही नहीं ....
लिखा तो बहुत था उसमे जो
 मैं कभी उसे कह ना पायी ...
लिखा  था क्यूँ उसकी बातें
मुझे सुननी अच्छी लगती है
और उसकी बातों के जवाब में
क्यूँ जुबां  कुछ कह नहीं पाती .....
और ये भी लिखा था क्यूँ मुझे 
उसकी आँखों में अपनी छवि
 देखनी अच्छी लगती है पर
नजर मिलने पर क्यूँ
पलकें झुक जाती है ........
आगे यह भी लिखा था क्यूँ
मैं उसके  आने का पल-पल
इंतज़ार करती हूँ
और उसके आ जाने पर क्यूँ
मेरे कदम ही नहीं उठते .......
रात को जाग कर लिखा ये प्रेम-पत्र ,
रात को ही ना जाने कितनी
बार पढ़ा था मैंने ,
न जाने कितने ख्वाब सजाये थे मैंने ,
वो ये सोचेगा ,
या मेरे ख़त के जवाब में 
क्या जवाब देगा ....!
सोचा था सूरज की पहली किरन
ही मेरा ये पत्र ले कर जाएगी ....
पर उस दिन सूरज की किरन ,
सुनहली नहीं रक्त-रंजित थी .......
मेरे ख़त से पहले ही उसका ख़त
 मेरे सामने था .......
लिखा था उसमे , उसने सरहद पर
मौत को गले लगा लिया .....
और मेरा पहला प्रेम-पत्र  मेरी मुट्ठी 
में ही दबा रह गया बन कर
एक मुड़ा-तुड़ा कागज़ का टुकड़ा........!