Thursday, 13 September 2018

यह जीवन है...

ये रिश्ते भी
अजीब होते हैं..

कुछ अपने हो कर
भी अपने नहीँ लगते ..

कुछ  पराए हो कर
भी पराए नही लगते ..

कुछ साथ हो कर भी
अजनबी लगते है ..

कुछ अजनबी भी
अपने लगते है ...

यह जीवन है,
अपनों से परायों,
परायों से अपनों के बीच
चलता रहता है ...

Thursday, 23 August 2018

समय के पदचिन्ह...

कुछ सुखद 
कुछ दुःखद 
कुछ अनुकरणीय 

खुरदरी -कठोर 
अनुभवों की जमीन पर 
जाता हुआ समय 

छोड़ जाता है 
पदचिन्ह अपने

समय के ये 
पदचिन्ह 
धुंधलाते नहीं 
बिखरते नहीं 
बे-रंग भी नहीं होते 

कचोटते हैं 
ह्रदय -तल को 
अडिग -अविरल 
लिए स्थायित्व। 






Monday, 23 April 2018

प्रेम तुम तब भी रहोगे

एक दिन
जब
यह धरा नहीं रहेगी,
धरा को घेर लेने वाले
ग्रह-नक्षत्र
नहीं रहेंगे ,
धरा को नापने वाले
दोनों ध्रुव
नहीं रहेंगे ,
धरा को
ढ़क लेने वाले
वृक्ष, नदियाँ - सागर
भी नहीं रहेंगे ,
प्रेम
तुम तब भी रहोगे |

Sunday, 1 April 2018

फिर भी इंतज़ार है ..



ना मिलने के
 दिन याद ,
ना ही बिछड़ने के
 दिन याद ,
याद रहे तो
 बस तुम।

शायद ,
जाते हुए
पतझड़ में
बहार से
आये थे तुम।
जाती हुयी
बहार में
चले भी गए थे।

यह मिलना -बिछुड़ना ,
दशकों की
बिछुड़न है
या
सदियों की ही
बिछुड़न है।
या हमेशा-हमेशा की।

फिर भी
इंतज़ार है
एक और
फिर से जाते हुए
पतझड़ में ,
आती हुई बहार का।








Wednesday, 21 March 2018

जख्म तो दिलों पर हरे रहते ही हैं

एक पत्ता
जो गिरा  है
अभी शाख से

बेशक 
पीला और जर्जर था.
फिर भी 
उसका  निशान बाकी है
शाख पर
अभी भी।

निशान तो
नहीं मिटते न,
किसी के चले जाने पर। 

जख्म तो
दिलों पर
हरे रहते ही हैं
कभी-कभी 
या 
सदा के लिए। 

Thursday, 21 December 2017

देह के जाने के बाद

देह के पञ्च तत्वों में 
विलीन हो जाने पर भी
खोजती है
उसे , उस घर का आँगन
उस घर की दीवारें
उस घर का छोटा सा आसमान,
सुनना चाहती है
उसके कदमों की आहट भी...
वह नहीं लौटेगी
यह सच मालूम है फिर भी,
तो
क्या सच में भुला दिया जाता है
किसी देह को ,
उसका पंच तत्वों में
विलीन हो जाने पर...
शायद नहीं,
क्योंकि
देह से विलग आत्मा
समा जाती है
घर के कोने-कोने में,
कण-कण में
बरसाती है प्रेम और स्नेह का
आशीर्वाद |

Monday, 20 November 2017

ਰੱਬ ਵਰਗੀ ਹੈ ਮਾਂ ਮੇਰੀ...( रब जैसी है माँ मेरी )

ਧਰਤੀ ਮਾਂ ਵਰਗੀ ਹੈ  ਮਾਂ ਮੇਰੀ।

ਜਿਵੇਂ ਘੁੱਮਦੀ ਹੈ
ਧਰਤੀ ,
ਆਪਣੀ ਹੀ ਧੁਰਿ ਤੇ।

ਇੰਝ  ਹੀ
ਆਪਣੇ ਘਰ ਦੀ ਧੂਰੀ  ਤੇ
 ਘੁੱਮਦੀ ਹੈ
ਮੇਰੀ ਮਾਂ ਵੀ।

ਬੱਦਲਾਂ ਵਰਗੀ ਹੈ ਮਾਂ ਮੇਰੀ।

ਜਿਵੇਂ ਨਿੱਘੇ ਸੂਰਜ ਨੂੰ
ਢੱਕ ਲੈਂਦਾ ਹੈ
ਬਚਾਉਂਦਾ ਹੈ ਲੋਕਾਂ ਨੂੰ
ਗਰਮੀ ਤੋਂ।

ਇੰਝ ਹੀ ਮੇਰੀ ਮਾਂ ਵੀ
ਬਚਾਉਂਦੀ ਹੈ ਮੈਂਨੂੰ ,
ਦੁਨੀਆਂ ਦੀ ਹਰ
ਬੁਰਾਈ ਤੋਂ।

ਰੱਬ ਵਰਗੀ ਹੈ ਮਾਂ ਮੇਰੀ।

ਜਿਵੇਂ ਰੱਬ
ਭੁੱਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ
ਮਨੁੱਖੀ ਭੁੱਲਾਂ।

ਇੰਝ ਹੀ
ਮੇਰੀ ਮਾਂ ਵੀ
ਲਗਾ ਲਿੰਦੀ ਹੈ ਮੈਂਨੂੰ ਗੱਲ,
ਭੁੱਲ ਜਾਂਦੀ ਹੈ
ਮੇਰੀ ਹਰ ਗ਼ਲਤੀ।


धरती माँ जैसी है माँ मेरी।

जैसे धरती घूमती  है
अपनी ही
 धुरी पर।

वैसे ही
मेरी माँ भी
घूमती है
अपने परिवार की धुरी पर।

बादलों जैसी है माँ मेरी।

जैसे बादल
ढक लेते हैं
गर्म सूरज को
बचाता है गर्मी से।

वैसे ही मेरी माँ भी
बचाती है मुझे ,
दुनिया की हर बुराई से।

रब जैसी है माँ मेरी।

जैसे रब
भूल जाता है
मनुष्यों की भूलें।

वैसे ही
मेरी माँ भी
लगा लेती है मुझे गले
भूल जाती है
मेरी हर गलती।