Thursday, 17 September 2015

बिखरे हुए अक्षर चुन कर...

बिखरे हुए
अक्षर
चुन कर
बना दिए जाते हैं
मन चाहे
शब्द ...
मनचाहे शब्दों की
कड़ी
बुन देती है
वाक्य की जंजीर...
इस जंजीर में
भरे जाते हैं
भावों के रंग...
और बन जाती है
विभिन्न रंगों के
भाव भरी
एक रचना...

Monday, 7 September 2015

हंसे या मुस्कुराएं...

जिन्दगी सम्भली सी
बंधी है
एक नियत  दायरे में ,
या
खुल कर
बिखरने को आतुर है ।

चुप रहें ,
बात करें ,
हंसे या
मुस्कुराएं....

सही राह
चलते रहना है
या
नई पगडंडियां भी
आजमाना है ।

बदहवास सी
भटकन ही तो है
यह जिंदगी ।

Monday, 31 August 2015

खिल जाएगी यह धरा ....

प्रेम के जो बीज,
मुट्ठी में बंद किए थे,
वे बीज दिए मैंने
सूनी , उदास धरा पर ।

रंग भरे
प्रेम के बीज
खेत की मेंढ पर
एक -एक कर के
बीज दिए है ।

कुछ यूँ ही
हथेली में रख
धरा पर
बिखरा दिए ।

एक दिन जरूर
नवांकुर फूटेंगे
रंग भरे बीजों से
खिल जाएगी यह धरा ।

एक-एक मेंढ
खिलेगी प्रेम के रंगों से,
खिले रंगों के ,
रंग भरी
चूनर ओढ
खिलखिला पड़ेगी यह धरती भी ।

Monday, 24 August 2015

तुम मुस्कुराओगे नहीं तो...

तुम चुप रहोगे
 तो क्या
बादल बारिश नहीं लाएगा
फिर तो
आसमान सूना ही
रहेगा शायद।

तुम बोलोगे नहीं
तो क्या
चिड़ियाँ सुर भूल जाएगी
फिर तो
बगिया सूनी ही रहेगी शायद।

तुम मुस्कुराओगे नहीं
तो क्या
सूरज दिन नहीं लाएगा
फिर तो
मेरे मन में अँधियारा ही रहेगा
यकीनन !

Tuesday, 11 August 2015

इस बरस..

इस बरस
नज़र आ रहे हैं 
चहुँ ओर उगे हुए 
आक , धतूरे 
और भांग के पौधे |

इस बरस
भुजंग 
आने लगे हैं बाहर 
आस्तीनों से ,
उठाने लगे है फन |

लगता है 
इस बरस,
चन्दन भी अधिक 
लपेटना होगा शिव को |
  

Sunday, 9 August 2015

इश्क में तेरे....

इश्क में तेरे
बदल लिया है वेश
फिरते हैं दर दर
तलाश में तेरी

दरस को तेरे
तरसे मेरे नैन
बस इक झलक
पा जाए
तर जाऊँ
भवसागर से

वेद पुराण
सब पीछे छोड़े
लिया है बस इक
तेरा नाम....

Wednesday, 5 August 2015

कहाँ है मेरे पद चिन्ह !

अनुकरण करते -करते ,
पद चिन्हों पर
चलते -चलते
भूल ही गए अपने क़दमों की आहट।

मालूम नहीं था
एक दिन गुम हो जाना है
इस धरा में मिल  जाना है
बन कर मिट्टी।
या
विलीन हो जाना है
वायु में
बिना महक ,बिना धुँआ।

बस यूँ ही चलते ही गए
अनुगामी बन
ढूंढी ही नहीं कभी
अपनी राह।

 पैरों की रेखाएं ,
पद्म चिन्ह
सब  गुम हो गए ,
चलते -चलते
क़दमों पर कदम रखते।

आज मुड़ कर देखा
कहाँ है मेरे
पद चिन्ह !
उन्हें तो निगल गयी है
तपती धूप।