Monday, 15 July 2024

इंतज़ार के पौरवे

आठ प्रहर सी
आठ उंगलियाँ

उंगलियों पर 
चौबीस घण्टे से पौरवें

कुछ- कुछ उंगलियाँ
रखती हैं
छब्बीस- सताईस पौरवे

सोचती हूँ कभी- कभी 
इंतज़ार वाली तकदीर लिए
रखती होगी
ये छब्बीस- सताईस पौरवे वाली
उंगलियाँ। 



10 comments:

  1. बहुत सुंदर भाव

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    1. रेणु जी बहुत शुक्रिया

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  3. बहुत सुंदर

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    1. बहुत शुक्रिया

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  4. बहुत शुक्रिया

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  5. अनूठी कल्पना

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  6. आपकी कविता ने मुझे रुककर सोचने पर मजबूर कर दिया। उंगलियों, पोरों और इंतज़ार को जोड़ने का तरीका बहुत अलग और प्रभावशाली लगा। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

    अधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
    धन्यवाद!

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