Tuesday, 4 December 2018

छोटा ही है, उदासियों का कैनवास..


बना लजिए
 कैनवास ,
उदासियों की चादर को।

जेबों में भरे
चमकीले रंगो से
सजा दीजिये
उस पर
चाँद और तारे।

निहारिये
उस पर
चांदनी में नहाये
ऊँचे पहाड़
और
कल-कल बहती नदियाँ।

उकेरिये 
आशाओं के
उम्मीदों के
सप्तऋषि ,
ग्रह -नक्षत्र भी।

छोटा ही है 
उदासियों का कैनवास,
जैसे कोई
 काली रात !

जरा सी देर और निहारिये ,
भोर का तारा
खुद ही टिमटिमाएगा,
खुद ही सज जायेगा
मन के रंगो से
सूरज की लालिमा से
बिना उकेरे ही।


 

8 comments:

  1. छोटा ही है
    उदासियों का कैनवास,
    जैसे कोई
    काली रात !

    ...बिलकुल सच...बहुत सुन्दर और प्रेरक प्रस्तुति...

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  2. नमस्ते,
    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 6 दिसम्बर 2018 को प्रकाशनार्थ 1238 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।
    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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  3. जो मज़ा इंतज़ार में है, वस्ले-यार में नहीं.

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    1. बहुत अच्छा लिखा है। ऐसे ही लिखते रहिए। हिंदी में कुछ रोचक ख़बरें पड़ने के लिए आप Top Fibe पर भी विजिट कर सकते हैं

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  4. आशा का दामन थामें सुंदर सार्थक रचना ।

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  5. बहुत सुन्दर..।

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  6. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2018/12/99.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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