Monday, 7 November 2016

और तुम मुस्कुरा देना

आऊं नज़र तुम्हें 
कभी , तो
नजरें न चुरा लेना...

देख लेना
बस नज़र भर के
और
मुस्कुरा देना...

सोचो तो जरा
कोहरा छा जाने से,
कम तो नहीं हो जाता
सूरज का वजूद ...

दूर हो जाने से
दूर चले जाने से 
कम तो नहीं हो जाता
तुम्हारे होने का अहसास...

बस यही सोच कर
मुझे याद कर के
मुस्कुरा देना....

Wednesday, 28 September 2016

लिखा है मैंने एक आखिरी प्रेम गीत...

ज़िन्दगी की रात में
लिखा है मैंने ,
एक आखिरी प्रेम गीत।

अगर सुनाई दे
तुम्हें ,
तो सुन लेना !

इसे सुन ने की भी
एक शर्त है मगर !

किसी के कहने -सुनने से नहीं ,
अगर मन से सुनो तो ही
सुनना !

यह मेरा प्रेम गीत
नहीं सुनाई देगा
किसी हृदय हीन को !

ह्रदय तल के
आखिरी तल से ,
उभरी टीस से निकला
यह गीत
तुम्हें सुनाई दे .
तो ही सुनना।

जिंदगी की रात है अब ,
भोर का क्या मालूम
हो भी या नहीं।

भोर के तारे में
मेरा गीत ,
सुनाई दे तो सुन लेना।


Friday, 9 September 2016

राह में ना मिला करो..

मन की उड़ान
रोके से नहीं रूकती
मुझसे तो

सामने मत
 आया करो
शिकायत है अगर
तुमको तो

गुम हुयी
पगडंडियों पर
क़दमों की रफ़्तार
रोके नहीं रुकती
मुझसे तो

राह में ना
मिला करो
शिकायत है अगर
तुमको तो..




Wednesday, 10 August 2016

सूरज/ चाँद का तुमसे कोई रिश्ता है क्या !

कसमें ली जाती हैं
हर रोज़
तुम्हें न देखने की
न मिलने की
और तुम्हें ना
सोचने की भी....

रोज़ की ली हुई
कसमें
टूट जाती है
या
तोड़ दी जाती हैं.....

सुबह सूरज के
 उगने पर,
रात को चाँद के
आ जाने पर......

सूरज/ चाँद का
तुमसे कोई रिश्ता है क्या !
कि कसम ही टूट
जाती है !


Tuesday, 2 August 2016

भेज दो उसी में से थोड़ा रंग


मन के  कैनवास की
तस्वीर के रंग
धुंधले हुए जाते हैं !

गडमगड हो गए हैं
वो सभी रंग,
 जो तुमने सजाए थे
तस्वीर बनाने में.....

कुछ खो गए,
कुछ धूमिल हो गए हैं
और
कुछ गुम हो गए हैं
तुम्हारी तरह ही
जो रंग दिए थे तुमने
संभाले रखने को....

मुझे याद है
कुछ रंग रह गया था
हथेलियों पर तुम्हारे भी...


तस्वीर अब
अगर बनेगी तो तुम्हारे ही रंगों से,

भेज दो उसी में से
थोड़ा रंग
अगर सहेज रखा हो तो ...






Tuesday, 12 July 2016

मैं क्यों बताऊँ तुम्हें...

क्या तुम जानते हो ,
लिखने में
जो स्याही
लगती है,
वह कहाँ से आती है !

तुम नहीं जानते,
 शायद
या
जानते तो हो
लेकिन
जानना नहीं  चाहते !

 मैं क्यों
बताऊँ तुम्हें फिर !




Tuesday, 7 June 2016

घर मेरा है बादलों के पार ....




दिन-रात
सुबह -शाम
भोर -साँझ
कुछ नहीं बदलते
दोनों समय का नारंगीपना.....

उजली दोपहर
अँधेरी काली आधी रात हो
सब चलता रहता है
अनवरत सा ....

सब कुछ
 वैसे ही रहता है
बदलता नहीं है !

किसी के ना होने
या
 होने से ....

फिर क्यों
भटकता है तेरा मन
बंजारा सा

दरवाजा बंद या
है खुला
क्यों झांक जाता है तू !

क्यों ढूंढ़ता है मुझे
गली-गली ,
नुक्कड़-नुक्कड़ !

यहाँ
मेरा कोई पता है ना
ना ही कोई ठिकाना ....

घर मेरा है
बादलों के पार !
मिलना है तो फैलाओ पर
भरो उड़ान,
चले आओ ....