मछलियाँ और स्त्रियां
कितना साम्य है
दोनों ही में !
मछलियाँ पानी में रहती है
और
पानी भरे रहती है आँखों में
स्त्रियां !
बिन पानी छटपटाती है
मछलियाँ
और
आँखों का पानी पोंछ
मुस्कुराती है स्त्रियां।
जाल में फँसा कर
मार दी जाती है मछलियाँ
और
रीत -रिवाज़,मोह - जाल में फंस
खुद ही
ख़त्म हो जाती है स्त्रियां।
अथाह-विशाल सागर है
मछलियों का घर
तलाशती है फिर भी
एक कोना कहीं।
स्त्रियों को
बना जग-जननी,
सौंप दिया है सारा संसार,
खोजती है फिर भी
अपनी जगह,अपनी जड़ें।
कितना साम्य है
दोनों ही में !
मछलियाँ पानी में रहती है
और
पानी भरे रहती है आँखों में
स्त्रियां !
बिन पानी छटपटाती है
मछलियाँ
और
आँखों का पानी पोंछ
मुस्कुराती है स्त्रियां।
जाल में फँसा कर
मार दी जाती है मछलियाँ
और
रीत -रिवाज़,मोह - जाल में फंस
खुद ही
ख़त्म हो जाती है स्त्रियां।
अथाह-विशाल सागर है
मछलियों का घर
तलाशती है फिर भी
एक कोना कहीं।
स्त्रियों को
बना जग-जननी,
सौंप दिया है सारा संसार,
खोजती है फिर भी
अपनी जगह,अपनी जड़ें।