Wednesday, 17 December 2014

जो बद् दुआ बन कर उमड़ रही है दुनिया की हर मां के हृदय से ....

चुप है एक माँ,
क्या कह कर मन को मनाए,
क्या समझाए किसी को ।

रोती हुई माओं के
साथ ही रो पड़ती है
 वह स्वयं....

प्रार्थना ,
सांत्वना
सभी शब्द छोटे और झूठे
नज़र आते हैं।

कब सोचा था किसी ने भी
विदा के लहराते हाथ
किताबें थामें हाथ ,
अंतिम विदाई लिए
खुद किताबों में लिखा इतिहास बना
दिये जाएंगे ।

जो दौड़ आते थे
माँ की एक पुकार पर
अब नहीं सुनाई  देती उनको
कोई भी आवाज़...

माँ किसी को बद् दुआ
कहाँ देती है !
लेकिन,
उसका तड़पता हृदय
दुआ भी तो नहीं देता ।

 वहशी दरिंदों को क्या
अपनी माँ का भी
ख्याल ना आया !
क्या उन्हें दूध का कर्ज
यूं किसी माँ की गोद
उजाड़ कर ही चुकाना था !

सुना है
माँ की  दुआ अमृत की
तो
बददुआ तेज़ाब की बरसात करती है ।

अब इंतज़ार है तो बस
उन वहशी दरिंदों पर
तेज़ाबी बरसातों के बरसने की,
जो  बद् दुआ बन कर उमड़ रही है
दुनिया की हर मां के हृदय से ।

Monday, 15 December 2014

चाँद का ग्रहण से गहरा नाता है....!

तस्वीर में चाँद था
या चाँद की तस्वीर थी 
क्या फर्क पड़ता है।

चाँद तो बस चाँद है
सुंदर सा
मन को हरने वाला
मनोहर.....!

तस्वीर का चाँद
मुस्कुराता दिखा
मनोहर मुस्कान के साथ।

मुस्कान जो दिखाई दी
क्या वह दिल से जुड़ी भी थी
या यूँ ही
तस्वीर की सुंदरता बढाने के लिए थी !

क्योंकि
आँखों में अब भी
उदासियां नज़र आती है
चाँद का ग्रहण से गहरा नाता है....!

शायद...!

Tuesday, 9 December 2014

बदला फिर क्या था ...!

सभी कुछ
वैसे ही था
जैसे बरसों पहले हुआ करता था ।
गाँव , खेत , जोहड़
वही गलियां...
गलियों में से गुजरता
बचपन भी वही था ।
खेतों की ओर
जाने वाली हवाएँ,
खेतों की तरफ
अब भी बहा ले
जाना चाह रही थी ।
और जोहड़ !
जोहड़ में तैरती भैंसो ने
अब तक
अपनी आदते नहीं बदली...
ऩा जाने
आपस में बतियाती है
या
खो जाने के भय से
अपनी गरदन रखे रहती है
एक दूसरी की पीठ पर....।
किनारे पर
कदम ताल करती
बतखों के कदम
अब भी सधे थे....
बदला फिर क्या था ...!
गाँव की हवा...
या
गाँव के लोगों के मिज़ाज...
सच्ची मुस्कुराहटें
कहीं दूर चली गई हो...
हर कोई
नकाब ओढे हुए ,
मुखोटों के पीछे से झांकता मिला...
वो बच्चे भी नज़र नहीं आए ,
जो जोहड़ किनारे
टूटी मटकी के टुकड़ों को
पानी पर तैरा दिया करते थे....
नज़र आए भी तो
किताबों के ढेर के नीचे दबे
या
मोबाइल फोन के
अंदर झांकते हुए...
शहरी जहरीली हवाएँ
असर कर रही है
गाँव के लोगों की
रीढ़ की हड्डी पर....
तभी तो ,
मैंने बिना रीढ़ के
लोगों को जन्मते देखा
मेरे बचपन के गाँव में...

Monday, 24 November 2014

खुशियों की चादर कितनी छोटी है....

उदासियों की चादर
बहुत बड़ी है
बहुत मोटी ,
खद्दर जैसी है।
या
खुरदरी सी
जैसे जूट हो।

कहीं  कोई छेद नहीं ,
झिर्री भी तो नहीं है।

कि कहीं से
उधेड़ देने की कोशिश तो की जाय।

कहीं कोई गरमाइश भी नहीं
कि
ओढ़ कर सुकून सा मिले।

उदासियों की चादर के आगे
खुशियों की चादर
कितनी छोटी है।

उधड़ी हुई सी ,
जगह-जगह झिर्रियां सी है।
छोटे -बड़े कई छेद हैं
उन पर भी पैबंद लगा है।

फिर भी
इस झिर्रीदार ,
पैबन्दों  से बिंधी
छोटी ही सही ,
खुशियों की चादर
कितना गरमाइश भरा सुकून है। 








Tuesday, 11 November 2014

मिट्टी की मूरतों में प्राण ही नहीं...

पत्थरों के शहर में
मिट्टी की मूरतें है।
अग्नि सी आंधियां
तेज़ाबी बरसातें है।

ना जाने क्यों
न पत्थर पिघलते हैं
और
न ही मिट्टी की मूरतें
भुरभुराती है।

पत्थरों को पिघलने की
चाहत ही ना रही ...
बसंत का इंतज़ार ही नहीं उसे,
तभी तो शायद
मिट्टी की मूरतों में प्राण ही नहीं
या जीने की ही चाह ना रही ।

Monday, 10 November 2014

अस्थियों के विसर्जन के मायने ही कहाँ रहे....

अस्थियों के
विसर्जन के साथ ही
कर दिया तर्पण
सम्बन्धों का भी....
बह गए सभी
रिश्ते ,
खत्म हुए सभी नाते....
तन के रिश्ते तन
तक ही थे शायद.
फिर
मन के विलाप का क्या
कुछ दिनों का रोना है....
मन से जुड़े रिश्तों का ,
तन से जुड़ी यादों का नाता
अस्थि यों के होने तक ही था क्या....
अस्थियां जब तक
अस्थि मज्जा से जुड़ी थी,
मजबूत ढाँचे में कसी थी
क्या तभी तक रिश्ते रहे ....
नहीं !
मन के रिश्ते ,
मन से ही जुड़े रहेे ।
फिर
अस्थियों के विसर्जन के
मायने ही कहाँ रहे....

Thursday, 6 November 2014

औरत सदा अकेली ही रहती है ..

औरत सदा
अकेली ही रहती है
कौन साथ देता है उसका !
कोई भी नहीं।

अपनी मंज़िल के लिए 
बढाती है वह खुद 
अपना पहला कदम ,
सहारा बनने के लिए 
कौन साथ देता है उसका !
कोई भी नहीं।

अपना पथ
स्वयं ही बुहारती -सवांरती ,
 पथ के कांटे भी 
खुद ही निकालती है। 

लेकिन 
जाने -अनजाने में 
अपने पीछे ही फैंक देती है वह ,
वे पथ के कांटे। 
उसे चुभन का 
अहसास ही नहीं हुआ  
कभी शायद। 

तभी तो 
उसके बाद 
आने वाली औरतों को 
विरासत में 
कांटे ही मिलते है बुहारने को। 

एक औरत ,
दूसरी औरत को
 फिर से अकेला छोड़ देती है ,


अपनी  राह खुद ही चलने को।