Tuesday, 28 May 2013

नारी ही बांधती सभी रिश्ते -नाते ...

नाते -रिश्ते
जैसे
खड़ी दीवारें ,
तपती धूप में खड़ी
भीगती बारिश में ,
सर्द हवाओं के थपेड़े झेलती ...

नारी ही बांधती
बन कर
छत की तरह
सभी रिश्ते -नाते ...

 सभी को समेट लेती
बचा लेती ,
तपती धूप
बरसती बारिश
सर्द हवाओं के  थपेड़ों से ...

मजबूत छत
 जैसी नारी
रिश्ते मिलते उसे
बर्फ की दीवारों से ...

बचाती -समेटती
नाते - रिश्तों को
नारी के हाथ क्या रहता
एक दिन
सिवाय
पिघली बर्फ के ...!




( चित्र गूगल से साभार )

Monday, 27 May 2013

हर किसी की अपनी -अपनी आशाएं है ......

भोर होते ही ,
जैसे चल पड़ती है 
जिन्दगी 
अपनी रफ़्तार पर ,
एक नयी आशा लिए 
इस आशा रूपी सागर पर ...

एक बूढी माँ को इंतज़ार
है अपने लाल का जो
सिर्फ पैसे के साथ सांत्वना ही
भेजता है ,
अगले त्यौहार पर आने की ...

एक ललना को इंतजार है ,
अपने सुहाग का जो दूर
परदेश गया है कमाने ...

एक बहन को इंतज़ार है ,
अपने भाई का जो उससे
रूठा है ,
इंतज़ार है उसे मायके की दहलीज़
से पुकार का ...

हर किसी की
अपनी -अपनी आशाएं है
इंतज़ार है ,
हर सुबह जो ले कर आती है ...

ये जिन्दगी की नाव तो रफ़्तार से
चलती ही रहती है ,
पर इसकी पतवार थामे हुए तो
वह ऊपर वाला ही है ,
जो हर किसी की आशा
पूरी करता है ..
.

चित्र गूगल से साभार 

Friday, 24 May 2013

ਭਾਵੇਂ ਤੂ ਚੁਪ ਰਹਿ ( चाहे तू चुप रहे )


ਭਾਵੇਂ  ਤੁੰ  ਚੁਪ ਰਹਿ
ਕੁਝ ਨਾ ਬੋਲ
ਮੈਂ ਤੇਰੀ ਚੁੱਪੀ ਨੁੰ ਵੀ
ਸੁਣ ਲੇਂਦੀ ਹਾਂ ...

 ਕਿਵੇਂ ...!
ਏ ਰਾਜ਼  ਤੁੰ ਨਹੀ ਜਾਣ ਸਕਦਾ ,
ਕਿਉਂਕਿ
ਮੈਂ  ਵੀ ਹਾਲੇ ਤਕ
ਇਹ ਰਾਜ਼ ਨਹੀ ਸਮਝੀ ...

ਪਰ ਤੈਂਨੂੰ  ਤਾਂ ਮੈਂ ਸਮਝ
ਹੀ ਗਈ ਹਾਂ
ਚੁਪ ਬੂਲੀਆਂ ਚ ਕੁਝ ਨਾ
ਬੋਲ ਕੇ ਵੀ
ਸਬ ਕੁਝ ਸਮਝਾ ਦੇਣਾ
ਇਹ ਤੇਰੀ ਆਦਤ
ਪੁਰਾਣੀ ਹੈ ...

ਅੱਜ ਵੀ ਤੁੰ  ਬਿਨਾ ਬੋਲੇ
 ਚਲਾ ਗਿਆ
ਤਾਂ ਕਿ ਮੈਂ ਅਣਸੁਣੀ ਰਹਿ ਗਈ
ਤੇਰੀ ਗੱਲਾਂ ,
ਤੇਰੀ ਹਰ ਸਾਂਸ ਮੈਂਨੂੰ ਹੀ
ਵਾਜਾਂ ਮਾਰਦੀ ਹੈ
ਭਾਵੇਂ ਤੁੰ ਕੁਝ ਨਾ ਬੋਲੇ ...

..........................................................................................................
चाहे तू चुप रहे
कुछ ना बोले
तेरी चुप्पी को भी मैं
सुन लेती हूँ ...

कैसे ...!
ये राज़ तूं नहीं जान सकता
क्यूंकि
मैं भी अभी तक
यह राज़ नहीं समझी ...

पर तुझे तो मैं समझ ही
 गई हूँ
चुप होठों से
कुछ ना बोल कर भी
सब कुछ समझा देना
यह तेरी पुरानी
 आदत है ...

आज भी तू बिन बोले
चला गया
तो क्या मैं अनसुनी रह गए
तेरी बातें ,
तेरी हर साँस मुझे ही
आवाजें देती है
चाहे तू कुछ न बोले ...


( चित्र गूगल से साभार )


Tuesday, 21 May 2013

जिन्दगी हर कोई जीता है ...


जिन्दगी क्या है ...!
हर कोई जीता है 
लेकिन ,
क्या हर कोई जीता है जिन्दगी ,
जिन्दगी की तरह ...!

पर नहीं शायद ,
कोई- कोई ही जीता है जिन्दगी ,
जिन्दगी की तरह ...

किसी को यह फूलों की राह
 नज़र आती है ,
कोई इसमें काँटों की चुभन की 
शंका लिए कदम ही 
नहीं बढ़ाता ...

चलने वाला
 काँटों से बचाता खुद को ,
कभी झेलता , 
 अपनी मंजिल भी पाता  है और 
फूलों की महक भी ...

रुक कर ठिठकने  वाला
 ना मंजिल पाता है 
और ना ही फूलों की महक ही ....

किसी को जिन्दगी लहराते -उफनते 
 सागर की तरह लगती  ,तो 
किसी को गहरे सागर की तरह ...

जो डर  जाता है 
सागर की गहराई से 
 खड़ा रहता है किनारे पर ही 
वह डर कर 
ना पार उतरता है ना मोती
 ही पाता है ...
लहराते -उफनते सागर में जो उतरता है 
वह पार भी जाता है , 
मोती भी पाता है ...

Sunday, 19 May 2013

हे सूर्य नारायण ...!


हे सूर्यनारायण ...!
तुम चलते रहते हो 
अथक , अनवरत ...

जैसे एक माँ अपनी संतानों 
पर बिना भेदभाव किये 
ममता लुटा देती है ,
वैसे ही , 
तुम भी तो 
इस धरा के हर प्राणी ,
हर एक भाग  पर ,
अपनी किरणों को लुटा कर 
प्रकाशमान कर  देते हो ...

 हे सूर्यनारायण ...!
मुझे तुम्हारी ये किरणे ,
भोर में नन्हे मासूम शिशु 
जैसी मुस्काती लगती है ...

दोपहर में एक मेहनत -कश ,
इंसान की तरह चमकीली 
और प्रेरणादायक 
लगती है ...

ढलती धूप , जैसे कोई 
प्रियतमा ने अपनी जुल्फें 
बिखरा दी हो और 
उसके साये में जरा 
विश्राम ही मिल जाये...

तुम्हारी सांझ की किरणे ,
अपनी बाहें फैला कर ,
जैसे सारी थकन को दूर 
करती ...

हे सूर्य नारायण ...!
तुम्हारे सातों  घोड़े ,
निरंतर चलायमान 
हो कर ,
सातों दिशाओं के 
प्रहरी बने रहते हैं ,
फिर भी कभी -कभी 
तुम्हारी नज़रों में 
इस जगत के रहने 
वालों के दुःख -संताप 
क्यूँ  नहीं आते ...!

फिर क्यूँ नहीं 
तुम उन दुखों को ,
संतापों को 
अपनी तेज़ किरणों से
 जला कर नष्ट कर  देते ...

( चित्र गूगल से साभार )

Saturday, 18 May 2013

उधेड़-बुन


हर रोज़ एक शब्द
सोचती हूँ
उसे बुन लेती हूँ
बुन कर सोचती हूँ
फिर उधेड़ देती हूँ ...

उधड़े  हुए शब्द
ह्रदय में
एक लकीर सी बनते
तीखी धार की तरह
निकल जाते हैं ...

सोचती हूँ यह शब्दों
का बुनना फिर
उधेड़ देना
यह उधेड़-बुन न जाने
कब तक चलेगी ...

शायद
यह जिन्दगी ही
एक तरह से
उधेड़ -बुन ही तो  है...

(  चित्र गूगल से साभार )

Friday, 17 May 2013

वह उसकी परछाई ही होती है ...


दुनिया में इंसान का 
हर रिश्ता ,
हर एक सम्बन्ध 
भरा  है
स्वार्थ और मतलब से ...

जो साथ रहती है 
एक सच्चे  मित्र की तरह ,
एक वफादार 
जीवन संगिनी की तरह, 
सुबह से लेकर शाम तक
 वह उसकी परछाई ही 
 होती है ...

यह परछाई 
भरी दुपहरी में उसके 
क़दमों तले रह कर भी 
साथ नहीं छोडती
कभी भी ...

गहरी अँधेरी रात में यह परछाई 
उसके अंतर्मन में 
छुप कर उसे सही 
राह भी दिखलाती है ........