Monday, 13 May 2013

चुप सी चल रही थी जिन्दगी ......


चुप सी चल रही थी
जिन्दगी ,
एक ठहरी हुयी सी
नाव की तरह ...
ना सुबह के होने की
थी कोई
उमंग ही ,
 ना ही शाम होने की
ललक ही ,
दिन  चल रहे थे
और रातें  रुकी हुई थी ..

सहसा  ये क्या हुआ ,
मेरे मन में ये कैसी
हिलोर उठी ,
शांत लहरों पर रुकी हुई
नाव की पतवार किसने
थाम ली ...!
क्या यह तुम्हारे आने
का इशारा है ....!


Thursday, 9 May 2013

हम बेटियों का घर ही धूप में क्यूँ ...!



सहसा उसे

 नानी का कथन

 याद आ गया 

"तेरा ससुराल तो

 धूप में ही बाँध देंगे...!"

जब उसने देखा 

दूर रेगिस्तान में

एक अकेला घर 

जिस पर ना कोई साया 

ना ही किसी 

दरख्त की शीतल छाया ,

एक छोटी सी 

आस की बदली को तरसता

वह घर .......!
और उसमे खड़ी एक औरत ...

तो क्या इसकी नानी भी

 यही कहती थी...?

पर नानी मेरा घर ही 

धूप में क्यूँ ,भाई का

क्यूँ नहीं ....!

शरारत तो वो भी करता है ...

इस निरुत्तर प्रश्न का 

जवाब तो उसने

समय से पा लिया

पर आज फिर 

नानी से यही प्रश्न करने को

मन हो आया
"

हम बेटियों का घर ही धूप में क्यूँ ...!


(चित्र गूगल से साभार )

Tuesday, 7 May 2013

जब सारे मोड़ ही मुड़ गए ...



इकरार और इनकार 

के बीच 

एक बार फिर 

से दुविधा ...


काश के तुम 

इकरार करते

तो क्या मैं 

इनकार कर पाती ...


 तुम हाथ बढ़ाते

तो क्या मैं साथ न 

चल पड़ती ...


इकरार किया भी

 तो किस 

मोड़ पर आ कर 

जब सारे मोड़ ही

मुड़ गए ...


जो लम्हे

 जिए थे साथ तुम्हारे 

आँखों से मोती बन कर

बिखरे पड़े है ,

उसी आँगन में ...

काश !

 तुम उन मोतियों

की माला मुझे 

पहनाते.......



Saturday, 4 May 2013

साथ छूट गया बरसों के इंतजार का ........

ख़त्म हुआ इंतजार ...!
एक पत्नी का 
एक बहन का 
और 
बेटियों का भी ...! 

इंतजार था 
एक सुबह वह भी आएगी 
जब सूरज उगेगा 
ऐसा भी ,
लाएगा साथ अपने 
एक ख़ुशी की किरण ...

किरणों पर होगा एक पैगाम 
आने का 
उसका जो , उनका अपना प्रिय है 
आँखों का तारा है ,
चला  आएगा राखी के तारों से बंधा 
अब खत्म हो गया इंतजार 
उन राखियों का भी ...

इंतजार था उसे भी 
उस चंदा का ,
जाने कितने करवा -चौथ के 
चाँद वारे होंगे उसकी चाह में 
अब खत्म हो गया इंतजार
 उस चाँद का भी ,
लील गया उसे भी एक गम का 
घना बादल ...!

बेटियां भी रह गयी 
बस ताकती सूनी राह 
तरसी थी बचपन से ही 
जिसकी बाहों में झूला झूलना ,
अब इंतजार था जिन  बाँहों का 
जो डोली में बैठाती 
ख़त्म हो गया उन बाँहों का इंतजार,
 छूट गया साथ ...

साथ छूट गया एक आस का 
बरसों के इंतजार का ........






Thursday, 2 May 2013

क्यूंकि यही तो जीवन है ...



मेरा जीवन जैसे कोई
जंगल हो पत्थरों का ........
संवेदना ,भावनाओं से परे ,
बेशक बिखरी है आस पास ,
चारों और चमकीली मणियाँ ,
और इन्ही पत्थरों को सर पर
सजा कर अक्सर जीवन की
मुस्कान ढूंढ़ती रहती हूँ  मैं............!
कभी इन बेजान पत्थरों में भी
फूल खिलाने और कभी खिलने
 का इंतज़ार करती रहती हूँ ,
क्यूंकि यही तो जीवन है ...........:)

Wednesday, 1 May 2013

अन्नपूर्णा.....


गहरे सांवले रंग पर

गुलाबी सिंदूर ,

गोल बड़ी बिंदी ...

कहीं से घिसी ,कहीं से

सिली हुई साड़ी पहने

अपनी बेटी के साथ ,

खड़ी कुछ कह रही थी

मेरी नयी काम वाली ..

 मेरी नज़र उस के चेहरे ,
गले और
बाहं पर मार की

ताज़ा -ताज़ा चोट पर

पड़ी 

और दूर तक

भरी गहरी मांग पर भी ...

मैं  पूछ बैठी ,

कितने बच्चे है तुम्हारे ,

सकुचा कर बोली जाने दो

बीबी ...!

क्यूँ ...?

तुम्हारे ही है ...!

या चुराए हुए ,

और तुम्हारा

नाम क्या है ,

बेटी का भी...

वो बोली नहीं -नहीं बीबी ...

चुराऊँगी क्यूँ भला 

पूरे आठ बच्चे है ...!

ये बड़ी है,

सबसे छोटा गोद में है ...

पता नहीं मुझे क्यूँ हंसी

आ गयी 

इसलिए नहीं कि उसके

आठ बच्चे है 

कि

अपने ही बच्चों की भूख

के लिए सुबह से शाम भटकती

"अन्नपूर्णा " और उसकी बेटी

" लक्ष्मी "...!

औरत को गढ़ना पड़ता है ....



औरतें  होती है 
नदिया सी 
 तरल पदार्थ की तरह 
जन्म से ही 
हर सांचे में रम
 जाती है ...

और पुरुष होते है  
पत्थर से 
 ठोस पदार्थ की तरह ,
औरत को  गढ़ना पड़ता है 

छेनी- हथौड़ा ले कर
इनको 
 अपने सांचे के अनुरूप ...

 एक अनगढ़ को 
गढने  की नाकाम 
कोशिशों में ,
ये औरतें सारी उम्र
लहुलुहान करती रहती 
अपनी उँगलियाँ और 
कभी अपनी आत्मा भी ...