Friday, 28 December 2012

तुम्हारा साथ .....


तुम्हारे साथ चला  नहीं जाता 
नहीं सहन होती अब मुझसे 
तुम्हारी बेरुखी .......

ये बेरुखी मुझे लहुलुहान  किये
 दे रही है ,
कब तक पुकारूँ तुम्हें ,
जब हो मेरी हर पुकार ही अनसुनी ...

 नहीं पुकारुगी तुम्हे  
ना ही मुड़ ,थाम कर कदम देखूंगी ,
तुम्हारी तरफ कातर निगाहों से ......

तोड़ डाले हैं सारे तार 
जो तुम संग  जोड़े थे कभी 
हर वह बात ,जो तुमसे जुडी थी ..........

यह जुडाव भी तो मेरा ही था 
तुम थे ही कब मेरे ,
कब चले थे साथ मेरे ...

कुछ गीले क़दमों से साथ चले 
और मैं साथ समझ बैठी ..
वो क़दमों का गीला पन तो कब का 
धूप में  घुल गया
मैं तलाशती रही वो कदमो के निशाँ .......   

 एक आस ,एक उम्मीद  
जो तुमसे लगा कर रखी थी मैंने ,
जाओ आज मुक्त कर दिया तुम्हे 
और मैं भी मुक्त ही हो गयी 
तुम्हारी यादों से ,
तुम्हारे झूठे वादों से .....

Friday, 21 December 2012

एक गृहिणी.......

एक गृहिणी
जब कलम उठाती है ...
लिखती है वह
खिलते फूलों पर
उगते सूरज पर
नन्ही किलकारियों पर
मासूम मुस्कानों पर ...


वह लिखती है
ममता की स्याही में
कलम को डुबो कर ....

 लेखनी में उसकी
उमड़ पड़ता है ढेर सारा
प्यार , दुलार और
बहुत सारा स्नेह ,
सारी  प्रकृति खिल उठती है ....

एक गृहिणी ,
एक नारी भी है
एक माँ भी है ......

क्या लिखे वह अपनी
 कलम से
दूसरी नारी की व्यथा
एक बेटी की दुर्दशा ...!

नहीं ,वह उठा ही नहीं
 पाती कलम
दर्द की स्याही से
' स्याह ' अक्षर नहीं लिख पाती ...






Tuesday, 4 December 2012

कुछ तैयारियां ...

पुरानी किताबें सहेजते 
अटक गयी नज़रे 
दिख गयी वही लाल -डायरी 
जिसमे लिखा था मैंने 
मुझी पर की गयी 
शिकायते ,
लानते ,
कुछ उलाहने 
मेरे पिता की मजबूरियों ,
मेरे निकम्मेपन पर 
की गयी टीका - टिप्पणियां ..
आज उन सबकी
समीक्षा कर डाली गयी
सभी बातों को
जहन में नोट कर लिया गया ...
जवान होते बेटे को देख
कुछ तैयारियां
मैंने भी कर डाली ...

Saturday, 1 December 2012

जीवन- संध्या


जीवन- संध्या की
एक सांझ 
 झुर्रियों से  भरे दो  हाथ 
एक -दूसरे को थामे
आँखों में आंसूं ,
बिछड़ने की 
आशंका लिए ...

एक हाथ
दूसरे हाथ को 
सहलाते हुए 
अब के बिछुड़े तो ना मिल 
सकेंगे कभी ,

दूसरे हाथ ने हाथ को
जकड़ते
से कहा नहीं !
तुम ऐसे -कैसे
जा सकते हो

तुमने ये हाथ
तब थामा था 
जब मुझे मेरी ही
पहचान  नहीं थी

तुम ही तो
इनको थाम कर 
मुझे सपनो की
दुनिया में लाये थे

फिर इनमे थमा दी थी
दुनिया की सारी खुशियाँ 
हर सुख -दुःख ,
धूप-छाँव में मेरा 
संबल बने ये हाथ,
तुम नहीं
छुड़ा कर जा सकते  ...

पहला हाथ
दूसरे की सलवटे सी हटाते 
जैसे मुस्करा रहा हो ,
थपथपाता रहा
 और आंसुओं से भीगता रहा .…