Wednesday, 31 October 2012

नन्हा

मैं छोटा सा ,नन्हा सा

और माँ कहती है

कि प्यारा सा ,

एक बच्चा हूँ....

प्यारा सा बच्चा

हूँ ......फिर भी

माँ स्कूल के

लिए जल्दी

जगा कर तैयार

करती .....

पता नहीं ये स्कूल

किसने बनाया होगा ...

मुझे तो कुछ भी

समझ आता

उससे पहले ही

टीचर जी लिखा

मिटा देती है ....

अब लिखा नहीं तो

कान भी मरोड़

देती है ....
अब लाल - लाल

कान लेकर घर

जाता हूँ तो ...

माँ आंसू भर के

गले लगा कर डांटती

है तो मुझे

अच्छा लगता है क्या ....

जब मैंने माँ को बताया ,

आज नालायक बच्चों

को एक तरफ बिठाया

उनमें से मैं भी एक था ...

पूछ बैठा कि माँ

यह नालायक क्या होता है ...

तो बस, माँ रो ही पड़ी ,

गले से लगा कर बोली

तुझे कहने वाले ही है रे

मेरे लाल ......

मैं अब भी नहीं समझा कि

टीचर जी ने ऐसा क्यूँ कहा..

Thursday, 25 October 2012

कान्हा वंशी फिर से बजा दो ...

कान्हा एक बार 
वंशी फिर से बजा दो ...
वह धुन छेड़ो ,
जिसे सुन कर 
हर कोई मंत्रमुग्ध सा 
हो रहे ...
किसी को कोई सुध-बुध
ही ना रहे ....
इस धरा का कण- कण ,
तुम्हारी वंशी की तान में
मोहित सा,
मंत्रमुग्ध हो रहे...
ऐसी ही कोई तान छेड़ो .
कान्हा ...!
मैं चली आऊं,
तुम्हारी वंशी की मधुर तान
की लय पर बहती हुयी .....

Monday, 22 October 2012

लेकिन वे फिर भी मुस्कुराती है ....


औरतें कभी भी और
किसी को भी
 नहीं लगती अच्छी
जब वे मुस्कुराती है ,
हंसती है ,
या खिलखिलाती है ......

लेकिन वे फिर भी मुस्कुराती है ....

जब, बचपन में
उनका खिलौना छीन कर
किसी और को दे दिया
जाता है
या उनको कमतर आँका
जाता है .......

और जब
उनके बढ़ते कदमो को
बाँध लिया  जाता लिया हो
या आसमान छूने की
तमन्ना के पर काट दिए जाते हों....

और
जब उनकी जड़ें एक आंगन
से दूसरे आंगन में रोप दी
जाती है ...चाहे
उस आँगन में उसे
गर्म हवाओं के थपेड़े ही
क्यों न सहन करना पड़े...

तब भी वे मुस्कुराती  ही है
क्यूंकि
उन्हें पता है उनके आंसूं जब
निकलेंगे तो
एक सैलाब जैसा ही कुछ
आ जाएगा इस धरा पर ......

अपने इन आंसुओं को
अपनी आँखों में ही छुपा कर
बस मुस्कुराती है ,
खिलखिलाती है .....

क्यूंकि नहीं अच्छी लगती
औरते कभी भी
मुस्कुराती हुई  ..........

Tuesday, 16 October 2012

रंग


दो कजरारी आंखे 
झपकाते हुए ,
सागर की  सी गहराई लिए 
आँखों से ...

मैं अक्सर 

तुम्हारी तस्वीर में
अपने रंग खोजती हूँ ,
जो रंग 

 कभी मैंने तुम्हें दिए थे ,
उनका क्या हुआ ...


सागर की सी गहराई लिए 
दो आँखे ,
 
कजरारी आँखों को 
एक टक देखते हुए ...

हाँ वो रंग,
 अभी भी मेरे पास है और 
बहुत प्रिय भी 

उन रंगों को  चाह कर 
भी मेरे जीवन 
के केनवास पर नहीं 

उतार पाता...

 मैंने वो  रंग 
अपने मन के कैनवास पर 
सजा रखे है 
कजरारी आँखें बरस पड़ी 
सागर सी गहराई वाली
 आँखों की गहराई 
कुछ और गहरी हो गयी ....

Friday, 12 October 2012

अस्थि कलश


गंगा की लहरों पर तैरते
 अस्थि कलश
 को देख सहसा मन में
 विचार उमड़ पड़ते हैं .......

कैसे एक भरा - पूरा इन्सान
अस्थियों में बदल कर
एक छोटे से कलश में समा
जाता है ...........

ना जाने ये किस की अस्थियाँ होंगी ....

शायद...!
 किसी वृद्ध / वृद्धा की ही हों ये अस्थियाँ ...
ना जाने उनके अरमान पूरे हुए भी
होंगे या नहीं ...
ना जाने कुछ हसरत  भी लिए उठ गए हों
 इस  दुनिया से ........

क्या मालूम...!
 ये अस्थियाँ  किसी माँ की ही हो ,
अपने नन्हों को जब बिलखते देखा होगा
तो क्या उसके प्राण एक बार फिर से
 देह पर मंडराए ना  होंगे ...
जरा छू कर देखोगे ये अस्थियाँ तो आज
भी गीली ही मिलेगी , रोती - बिलखती
ममता से सराबोर ....

ये भी हो ...!
ये अस्थियाँ एक पिता की ही हो ,
जो बहुत मजबूर होकर
 इस दुनिया से गया हो , उसे कब
भाया था , अपने नन्हों के ,
नन्हे-नन्हे कन्धों को  जिम्मेदारियों
के बोझ से लादना.....

अब तो सोच कर ही आत्मा काँप
उठती है ....
ना जाने ये अस्थियाँ किसी अधखिले
फूल / कलि की ही ना हो ...
इनके अपनों ने ,
कैसे सहन किया होगा इनका बिछोह ,
क्या वो अब भी तड़प ना रहे होंगे ....

गंगा की लहरों पर तैरता
 यह अस्थि कलश  ना जाने किस की
आत्मा को मोक्ष दिलवाने जा रहा है ....
और
जिसकी अस्थियाँ इस कलश में है ,
उसके अपनों को मोक्ष कहाँ मिलेगा ,
शायद उनके जीते जी तो नहीं ...

Tuesday, 9 October 2012

प्रेम की सरगम

कोई आँखों से दिल की
बात कहता रहा , 
और कोई पलके मूंदे 
ख्वाब ही बुनता रहा ........
रहा अनजान उन आँखों की 
इबारत से ,
बस अपनी ही धुन में रहा
हो कर मगन .......
कोई पुकारता रहा आँखों से ,
अपने गीतों से ......
और कोई
सुर में ही खोया रहा ...
रहा अनजान उन प्रेम भरे
सुरों की सरगम से ,
अचानक ये सुर कैसे बदले
किसी के,
कोई
ऐसा क्या कह बैठा ,
और कोई क्या समझा गया.......
किसी की आँखों से
प्रेम के अश्रु
और मन प्रेम की सरगम में
बह निकला ....


Monday, 8 October 2012

संयम


महाभारत का कारण 
अक्सर
 असंयमित वाणी 
और असंयमित आचरण 
ही होता है ........
शांतनु ने अगर काम पर 
संयम रखा होता 
तो क्या ,
देवव्रत को भीष्म होना 
पड़ता ...!
तब 
महाभारत की नीव ही नहीं
रखी जाती .......
गांधारी का भी तो आचरण 
असंयमित ही था ,
अगर 
अपने नेत्रों पर पट्टी 
ना बांधी होती 
तो क्या ,
उसकी संतान ऐसी 
कुसंस्कारी और दुष्कर्मी 
होती ,
ना ही महाभारत की 
सम्भावना होती .........
 अगर संयमित आचरण 
दुर्योधन ने भी किया होता 
तो  क्या ,
वह रिश्तों को तार - तार 
करता...!
और ना ही महाभारत होती ...
द्रोपदी को भी तो 
थोड़ा संयम अपनी वाणी 
पर रखना ही था......
आखिर असंयमित वाणी 
ही तो कारण होती है 
महाभारत का...

Saturday, 6 October 2012

मन तो मन ही है ......


मन तो मन ही है 
ना जाने कब ,
किस जहाँ की ओर उड़ चले ....
लेकिन ,
जब - जब मन ने उड़ान 
भर कर 
घर की देहरी पार करनी चाही
तो ना जाने कितने रेशमी 
तार क़दमों में आ कर 
उलझा दिए गए ,
इन रेशमी तारों की उलझन
 सुलझाने 
और गाँठ  लगने से बचाने में ही 
जीवन कट गया ,
भले ही कभी उंगलिया लहू -लुहान 
ही क्यूँ ना हो गयी हो ...
लेकिन , 
फिर भी , 
इस मन ने उड़ान भरनी तो नहीं 
छोड़ी ,
आज ये मन एक बार फिर 
चाँद को छूने को चल 
पड़ा है ....
देखें अब कौन रोकता है मन को 
उड़ान भरने से .....

Wednesday, 3 October 2012

उनका मैं क्या करूँ .....


उसको भूलने के जूनून में ,
वे सूखे  'गुलाब '
जो उसने दिए थे कभी ,
मैंने जिन्हें रख दिया था ,
कुछ किताबो में छुपा कर ,
यादों की तरह ,
वे सूखे फूल , आज मैंने
बिखरा दिए .....
लेकिन ,किताबों के
पन्ने -पन्ने में
जो उनकी महक छुपी है ,
उनका मैं क्या करूँ .....