Saturday, 1 December 2012

जीवन- संध्या


जीवन- संध्या की
एक सांझ 
 झुर्रियों से  भरे दो  हाथ 
एक -दूसरे को थामे
आँखों में आंसूं ,
बिछड़ने की 
आशंका लिए ...

एक हाथ
दूसरे हाथ को 
सहलाते हुए 
अब के बिछुड़े तो ना मिल 
सकेंगे कभी ,

दूसरे हाथ ने हाथ को
जकड़ते
से कहा नहीं !
तुम ऐसे -कैसे
जा सकते हो

तुमने ये हाथ
तब थामा था 
जब मुझे मेरी ही
पहचान  नहीं थी

तुम ही तो
इनको थाम कर 
मुझे सपनो की
दुनिया में लाये थे

फिर इनमे थमा दी थी
दुनिया की सारी खुशियाँ 
हर सुख -दुःख ,
धूप-छाँव में मेरा 
संबल बने ये हाथ,
तुम नहीं
छुड़ा कर जा सकते  ...

पहला हाथ
दूसरे की सलवटे सी हटाते 
जैसे मुस्करा रहा हो ,
थपथपाता रहा
 और आंसुओं से भीगता रहा .…