Saturday, 1 December 2012

जीवन- संध्या


जीवन- संध्या की
एक सांझ 
 झुर्रियों से  भरे दो  हाथ 
एक -दूसरे को थामे
आँखों में आंसूं ,
बिछड़ने की 
आशंका लिए ...

एक हाथ
दूसरे हाथ को 
सहलाते हुए 
अब के बिछुड़े तो ना मिल 
सकेंगे कभी ,

दूसरे हाथ ने हाथ को
जकड़ते
से कहा नहीं !
तुम ऐसे -कैसे
जा सकते हो

तुमने ये हाथ
तब थामा था 
जब मुझे मेरी ही
पहचान  नहीं थी

तुम ही तो
इनको थाम कर 
मुझे सपनो की
दुनिया में लाये थे

फिर इनमे थमा दी थी
दुनिया की सारी खुशियाँ 
हर सुख -दुःख ,
धूप-छाँव में मेरा 
संबल बने ये हाथ,
तुम नहीं
छुड़ा कर जा सकते  ...

पहला हाथ
दूसरे की सलवटे सी हटाते 
जैसे मुस्करा रहा हो ,
थपथपाता रहा
 और आंसुओं से भीगता रहा .… 

8 comments:

  1. जीवन संध्या में अक्सर ऐसा देखा और सुना गया है लेकिन नियत के आगे किस की चली है

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया राकेश जी

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  2. ईश्वर के नियति के आगे किसी का बस नही,,,

    recent post : तड़प,,,

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    1. सच कहा आपने धीरेन्द्र जी ....आभार

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  3. सुन्दर...हृदयस्पर्शी रचना...

    अनु

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया अनु जी

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  4. शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन,पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब.

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  5. dil ko chhune wali.. marmsparshi...!
    jeevan ke utrardh ka pyar hi sabse behtareen hota hai..
    pati patni.. bhai bahan jaise ho jate hain:)

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